भारत में गिद्धों की तेजी से घटती आबादी न केवल पर्यावरण के लिए बल्कि मानव जीवन के लिए भी बड़ा खतरा बन गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, गिद्धों के विलुप्त होने के कारण देश में लाखों लोगों की मौतें हुई हैं। इन मौतों की वजह बीमारियों के फैलाव और कचरा प्रबंधन की विफलता को बताया जा रहा है।
कैसे हुआ गिद्धों का विलुप्त होना?
1990 के दशक में भारत में गिद्धों की संख्या लाखों में थी, लेकिन डाइक्लोफेनाक नामक एक वेटरनरी दवा के उपयोग के कारण इनकी संख्या में 95% से अधिक की गिरावट आई। यह दवा मवेशियों को दी जाती थी, लेकिन जब ये मवेशी मरते थे और गिद्ध उनका मांस खाते थे, तो गिद्धों की मौत हो जाती थी।
डाइक्लोफेनाक दवा के कारण गिद्धों की किडनी फेल हो जाती थी।
गिद्धों की कमी का असर मानव जीवन पर
गिद्धों की कमी के कारण मृत जानवरों का सही तरीके से निपटान नहीं हो पाता। इसके कारण मृत जानवरों के सड़े-गले शव कई दिनों तक खुले में पड़े रहते हैं, जिससे बीमारियां फैलती हैं।
गिद्धों के विलुप्त होने के कारण जंगली कुत्तों और चूहों की आबादी में भारी वृद्धि हुई है। ये जानवर रैबीज और प्लेग जैसी बीमारियों को फैलाने में अहम भूमिका निभाते हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत में रैबीज के कारण हर साल करीब 20,000 मौतें होती हैं, जो गिद्धों की कमी का सीधा परिणाम है।
गिद्धों की अहम भूमिका
गिद्ध प्राकृतिक सफाईकर्मी कहलाते हैं। वे मृत जानवरों के शवों को खाकर पर्यावरण को साफ रखते हैं।
गिद्धों के विलुप्त होने से:
- मृत जानवरों का निपटान नहीं हो पाता।
- संक्रामक बीमारियां फैलती हैं।
- जंगली कुत्तों की संख्या बढ़ती है, जिससे रैबीज के मामले बढ़ते हैं।
गिद्धों के विलुप्त होने का प्रभाव
- रैबीज के मामले बढ़े:
गिद्धों की कमी के कारण जंगली कुत्तों की संख्या में वृद्धि हुई है। ये कुत्ते इंसानों को काटते हैं और रैबीज फैलाते हैं। - पानी और मिट्टी प्रदूषित होती है:
मरे हुए जानवरों के शव नदी और मिट्टी को दूषित कर देते हैं, जिससे पानीborne बीमारियां फैलती हैं। - प्लेग का खतरा:
चूहों की संख्या बढ़ने से प्लेग जैसी घातक बीमारियों के लौटने का खतरा बढ़ गया है।
सरकार की पहल
गिद्धों की गिरती संख्या को देखते हुए सरकार ने डाइक्लोफेनाक दवा पर प्रतिबंध लगाया है। इसके अलावा, गिद्ध संरक्षण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, जिनके तहत गिद्ध प्रजनन केंद्र स्थापित किए गए हैं।
सरकार के प्रयासों के बाद गिद्धों की संख्या में धीरे-धीरे सुधार हो रहा है, लेकिन यह प्रक्रिया काफी धीमी है।
गिद्ध संरक्षण के लिए जरूरी कदम
- डाइक्लोफेनाक के विकल्प:
डाइक्लोफेनाक के विकल्प के रूप में मेलोक्सिकैम नामक दवा को बढ़ावा दिया जा रहा है, जो गिद्धों के लिए सुरक्षित है। - प्रजनन केंद्रों की स्थापना:
देशभर में कई गिद्ध प्रजनन केंद्र बनाए गए हैं। - जागरूकता अभियान:
गिद्धों के संरक्षण के लिए स्थानीय समुदायों को जागरूक किया जा रहा है।
गिद्धों की संख्या में सुधार
हाल के वर्षों में गिद्धों की संख्या में कुछ सुधार हुआ है। उत्तराखंड, मध्य प्रदेश और असम जैसे राज्यों में गिद्ध प्रजनन केंद्रों ने गिद्धों की संख्या को स्थिर करने में मदद की है।
विशेषज्ञों की राय
पर्यावरणविद् डॉ. रवि मेहरा का कहना है:
“गिद्धों के विलुप्त होने का प्रभाव केवल पर्यावरण पर नहीं बल्कि मानव स्वास्थ्य पर भी पड़ा है। अगर हम जल्द ही गिद्धों की आबादी नहीं बढ़ाते, तो आने वाले वर्षों में इससे बड़ी महामारी का खतरा हो सकता है।”
गिद्ध संरक्षण के फायदे
- संक्रामक बीमारियों में कमी
- जंगली कुत्तों की संख्या नियंत्रित
- पर्यावरण का संतुलन बनाए रखना
निष्कर्ष
गिद्धों के विलुप्त होने का प्रभाव केवल पर्यावरण पर ही नहीं, बल्कि मानव जीवन पर भी पड़ा है। इससे बीमारियों का खतरा बढ़ा है और लाखों लोगों की मौतें हुई हैं।
गिद्धों को बचाने के लिए सरकार और समाज को मिलकर काम करना होगा ताकि पर्यावरण संतुलन बनाए रखा जा सके और मानव जीवन को सुरक्षित किया जा सके।

