महाराष्ट्र की महायुति सरकार में वरिष्ठ नेता छगन भुजबल ने एक बार फिर मंत्री पद की शपथ ग्रहण की। उन्होंने मंगलवार सुबह 10 बजे राजभवन, मुंबई में राज्यपाल सी. पी. राधाकृष्णन के समक्ष शपथ पत्र भरा ।
📌 समारोह का प्रमुख विवरण
- शपथ ग्रहण समारोह में मौजूद राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, तथा एनसीपी नेता अजित पवार भी थे।
- समारोह में प्रशासनिक और विधायिका के कई उच्च अधिकारी और मंत्री भी शामिल थे ।
🧭 पार्श्वभूमि और राजनीतिक संकेत
- भुजबल की वापसी एनसीपी (अजित पवार गुट) की ओर से धनंजय मुंडे के इस्तीफे के बाद की गई, जिन्होंने मार्च 2025 में स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए त्यागपत्र दिया था।
- यह कदम ओबीसी समुदाय में सरकार की पकड़ मजबूत करने की दिशा में रणनीतिक माना जा रहा है, खासकर निकाय चुनावों को ध्यान में रखते हुए ।
- इससे पहले दिसंबर 2024 में मंत्रिमंडल विस्तार में उनका नाम नहीं लिया गया था, जिस पर उन्होंने नाराजगी भी जताई थी ।
🎤 भुजबल और अन्य नेताओं की प्रतिक्रियाएं
- शपथ के बाद भुजबल ने स्पष्ट कहा कि वह किसी विभाग के लिए लालायित नहीं हैं और जो जिम्मेदारी दी जाएगी, उसे पूरी निष्ठा से निभाएंगे ।
- उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने कहा, “भुजबल जी पहले भी मंत्री रह चुके हैं और उनके अनुभव से सरकार को लाभ मिलेगा” ।
- भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष चंद्रशेखर बावनकुले ने भी भुजबल का स्वागत करते हुए कहा कि ओबीसी समुदाय की आवाज़ इससे मजबूत होगी ।
🧩 राजनीतिक मंथन और विवाद
- माराठा और ओबीसी समुदायों में मतभेद उभरकर सामने आए, जहां माराठा समुदाय के कुछ कार्यकर्ताओं ने इस निर्णय पर नाराज़गी जताई, वहीं ओबीसी नेताओं ने स्वागत किया ।
- समाज सुधारक अंजलि दमणिया ने सवाल उठाया कि क्या ऐसे नेता जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले लंबित हैं, मोदी सरकार और फडणवीस की नैतिकता पर प्रश्न खड़े नहीं करते ।
✅ निष्कर्ष
छगन भुजबल का मंत्री बनना सिर्फ एक व्यक्तिगत राजनीतिक वापसी नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की सियासत में ओबीसी–माराठी समीकरण, निकाय चुनाव और भी व्यापक रणनीतिक दृष्टिकोण से देखे जा रहे हैं। आदिवासी–दलित–ओबीसी नेतृत्व में संतुलन बचाने की कवायद की बात राजनीतिक विश्लेषकों के लिए अब और महत्वपूर्ण हो गई है।

