अशोका यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर और राजनीतिक विज्ञान विभागाध्यक्ष अली खान महमूदाबाद को उनके सोशल मीडिया पोस्ट—जो “ऑपरेशन सिंदूर” पर थे—के कारण 18 मई को गिरफ्तार किया गया था। उन्हें दो दिन की पुलिस हिरासत के बाद 14 दिन की न्यायिक हिरासत (judicial custody) में भेजा गया, और अगली सुनवाई 27 मई को निर्धारित की गई ।
🧵 मामले की रूपरेखा:
- क्या कहा गया था: 8 मई को फेसबुक पर पोस्ट में महमूदाबाद ने लिखा था कि “दो महिला अफसरों की प्रेस कॉन्फ्रेंस का ऑप्टिक्स महत्वपूर्ण है, लेकिन जब तक यह ग्राउंड रियलिटी में अनुवादित नहीं होता, यह सिर्फ ‘hypocrisy’ है।”
- आरोप: हरियाणा पुलिस ने उन पर दो एफआईआर दर्ज की, इनमें “महिलाओं की शील भंग,” “धार्मिक समूहों में वैमनस्य,” और “भारतीय संविधान की अखंडता को खंडित करने” जैसे सेक्शन शामिल हैं ।
🏛️ कानूनी लड़ाई और सुप्रीम कोर्ट की दखल:
- 21 मई को प्रेस कॉंटैक्ट:
सुप्रीम कोर्ट ने महमूदाबाद को इंटरिम जमानत (interim bail) देते हुए कहा कि वे जांच में सहयोग करें, लेकिन सोशल मीडिया पर चर्चा न करें और टिप्पणी न करें, जैसा कि कोर्ट ने आदेश दिया । - वहीं जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने हरियाणा SIT को नसीहत दी कि वह सिर्फ उन दो एफआईआर तक ही जांच सीमित रखे और किसी अन्य पहलू के लिए जगह बनाते न जाएं ।
📣 आलोचना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता:
- अमнести इंटरनेशनल और विभिन्न मानवाधिकार समूहों ने पुलिस की कार्रवाई को अव्यावहारिक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार बताते हुए तुरंत रोकने की मांग की ।
- स्वतंत्र चिंतक और मीडिया विश्लेषकों ने इसे चुनी हुई कार्रवाई बताते हुए चेतावनी दी है कि इससे विचारधारा की स्वच्छता और अकादमिक स्वतंत्रता को ठेस पहुंचेगी ।
👨🏫 प्रोफेसर का प्रोफाइल—अली खान महमूदाबाद:
- शैक्षणिक परिचय: लखनऊ में जन्मे, लंदन और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पढ़े, वे सोशल साइंसेज में PhD कर चुके हैं ।
- राजनीतिक पृष्ठभूमि: 2019–22 में समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता रहे, फिलहाल अशोका यूनिवर्सिटी में फैकल्टी के प्रमुख हैं ।
🔍 मामले की वर्तमान स्थिति:
| स्थिति | विवरण |
|---|---|
| हिरासत | न्यायिक हिरासत 27 मई तक |
| सुनवाई | अगली सुनवाई सुप्रीम कोर्ट या स्थानीय कोर्ट में |
| जांच | हरियाणा SIT द्वारा सीमित जांच |
| प्रतिबंध | सोशल मीडिया टिप्पणी पर पाबंदी |
🔚 निष्कर्ष:
अली खान महमूदाबाद का यह मामला अभिव्यक्ति की सीमा, अकादमिक स्वतंत्रता और सरकारी जांच की सीमा जैसे मुद्दों पर एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट की तरफ से जांच सीमित रखने और बोलने की आज़ादी को प्राथमिकता देने वाले निर्देश इसे मनबहलाव या राजनीतिक दमन नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा बनाते हैं। आगे की सुनवाईयाँ इस परिप्रेक्ष्य को और स्पष्ट करेंगी।

