भारत–फ्रांस राफेल‑एम विमान सौदा: भारतीय नौसेना की ताकत को मिला नया आयाम

भारत–फ्रांस राफेल‑एम विमान सौदा: भारतीय नौसेना की ताकत को मिला नया आयाम


भारत और फ्रांस के बीच 28 अप्रैल को एक ऐतिहासिक ₹63,000 करोड़ (लगभग $7.5 अरब) का रक्षा सौदा अंतिम रूप पाया। इसके तहत भारत ने 26 राफेल‑मरीन (Rafale‑M) विमान खरीदने का समझौता किया, जो भारतीय नौसेना के विमानवाहक पोतों पर तैनात किए जाएंगे ।


🔍 सौदे की प्रमुख जानकारियाँ

विवरणतथ्य
कुल कीमत₹63,000 करोड़ (≈ $7.5 अरब)
विमान की संख्याकुल 26 – जिसमें 22 सिंगल‑सीटर और 4 ट्विन‑सीटर ट्रेनर शामिल हैं
तैयार समयपहला बेड़े 2028 में, पूरी डिलीवरी 2030 तक पूरी हो जाएगी
तैनाती के पोतINS विक्रांत एवं INS विक्रमादित्य पर संचालित
पैकेज में शामिलहथियार, स्पेयर पार्ट्स, मेंटेनेंस, ट्रेनिंग, तकनीकी सहायता

🌊 क्यों है यह सौदा रणनीतिक मायने रखता?

  1. समुद्री शक्ति में वृद्धि
    राफेल‑एम विमान भारत की समुद्री क्षमता को मजबूत करेंगे, खासकर हिंद‑महासागर में चीन और पाकिस्तान जैसी चुनौतियों का सामना करते समय ।
  2. MiG‑29K का विकल्प
    इन विमानों से मिग‑29K की जगह ली जाएगी, क्योंकि राफेल‑एम अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी के साथ बेहतर रखरखाव क्षमता प्रदान करेगा ।
  3. समुद्री स्ट्राइक क्षमताओं में मजबूती
    Meteor और Exocet जैसे मिसाइल हथियारों के साथ ये विमान समुद्र और भूमि पर हमले, हवाई रक्षा और विमान वाहक रक्षा के लिए सक्षम होंगे ।
  4. भारत–फ्रांस रणनीतिक साझेदारी
    यह सौदा दोनों देशों के बीच रक्षा और तकनीकी सहयोग को गहरा करता है, साथ ही भारत को उड़ान प्रशिक्षाण एवं टीओटी जैसे लाभ भी मिलते हैं ।

🗣️ अधिकारियों की टिप्पणियाँ

  • रक्षा मंत्रालय के अनुसार, यह डील भारतीय नौसेना के विमान‑वाहक पोतों की क्षमता को बढ़ाने और अभियान‑तैयारी को बढ़ावा देने वाली है ।
  • दसो ऑविएशन के सीईओ Éric Trappier के अनुसार, यह नया समझौता भारत को राफेल‑एम का पहला अंतरराष्ट्रीय ऑपरेटर बनाता है ।

⏳ आगे का रास्ता

  • डिलीवरी: पहला सेट 2028 में, फिर अगले 2 वर्षों में बेड़े का विस्तार ।
  • प्रशिक्षण: पायलट और मेंटेनेंस क्रू का प्रशिक्षण भारत और फ्रांस में चलेगा ।
  • तकनीकी मदद: स्कैनर्स, सिमुलेटर, और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क तैयार करना मुख्य लक्ष्य होगा ।

📌 निष्कर्ष

भारत–फ्रांस के बीच राफेल‑एम सौदा सिर्फ लड़ाकू विमानों की खरीद नहीं, बल्कि यह समुद्री रणनीति, रक्षा सहयोग, और क्षमता निर्माण का एक बड़ा कदम है। इससे भारतीय नौसेना को अपनी विमानवाहक क्षमता को मजबूत करने में मदद मिलेगी और आने वाले वर्षों में स्वदेशी विमानों के विकास के दौरान यह अस्थायी लेकिन अत्यन्त आवश्यक पूरक साबित होगा।